Sunday, July 4, 2010

नुक्कड़ नाटक : सवा सेर गेंहू

नुक्कड़ नाटक : सवा सेर गेंहू

सवा सेर गेंहू नाटक का मंचन पेम गाँव में किया गया नाटक के द्वारा लोगों को पैसे उधार लेने, और ना पढ़े होंगे के क्या नुकशान है, ये दिखाया गया










Saturday, June 12, 2010

शिक्षा : दिवास्वपन

सलाम साथियों

अभी हाल ही में मैंने एक पुस्तक जिसका नाम "दिवास्वपन" उसको बहुत ध्यान से पढ़ा मुझे उस किताब में कही बातें बहुत अच्छी लगी और मैं एक सपनों की दुनिया में खो गया और एक ऐसे स्कूल और शिक्षा पद्धति की परिकल्पना करने लगा जो की बिलकुल किताब की तरह ही थी, और जो सब गिजु भाई चाहते थे शिक्षा को लेकर उसी अनुसार सब चल रहा था, बच्चों को जो विषय अच्छा या मन कर रहा है उसी की पढाई हो रही है, बच्चे जो चाहते है उसी अनुसार सब चल रह था (पढाई को लेकर)।

अचानक मेरी नीद टूटी और मैं अपने सपने से बाहर आया। और मैं सोचने लगा क्या यार ये सब हो सकता है। क्यों की मैं भी करीब २ साल से बच्चों को पढ़ने से जुदा हुआ हू और मुझसे मेरे साथियों ने ये किताब पढने के लिए कंहा था और मुझे नौकरी पर रखते समय ये कंहा गया था की आप इन किताबो को जरुर पढ़ ले। मैं किताब पढ़ कर सोचने लगा, की क्या मेरे वरिष्ट साथियों ने ये किताब नहीं पढ़ी, या किताब पढ़ कर उन्होंने उसको अमल नहीं किया, अगर इनमे से कोई भी एक कारण सही है तो उन्होंने मुझे वो किताब पढने के लिए क्यों कंहा ? मुझे इस सवाल का उत्तर नहीं मिला। मुझे एक चीज आज तक समझ में नहीं आती की हमको बताया तो जाता है की ऐसा करना चाहिए और जब करने जाते है तो हमको कंहा जाता है की क्या यार क्या कर रहे हो इससे भी कुछ होगा.......

साथियों मैं अभी अपने सवालो के उतार नहीं ख़ोज पाया हू अगर आप लोगों के पास मेरे सवालो के उत्तर हो तो जरुर बताएं।

Wednesday, June 9, 2010


बाल कविता : एक मकान में चार दुकान।

एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान।।
चारो दुकानों में मोटे हलवाई।
करते रहते दिन रात लड़ाई॥
लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे।
दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥
चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश।
उस दिन चारों हलवाई नहीं करते थे बकवास॥
एक मकान में चार दुकान।
बनते थे सब में पकवान॥

लेखक : ज्ञान कुमार
कक्षा : सात

Friday, May 7, 2010

सलाम साथियों
हमारा मंच के कुछ साथियों ने एक शिकायत केंद्रीय लेबर डिपार्टमेंट में लगाई और उनको बताया की किस तरह से आई आई टी कानपुर के अंदर श्रम कानूनों कहा पालन नहीं होता है और श्रम कानून आई आई टी कानपुर के अंदर एक मजाक है। इस शिकायत की जाच की करने के लिए लेबर डिपार्टमेंट से दो अधिकारी आई आई टी कानपुर में आये और उन्होंने कुछ चीजो को को देखा और पाया की सही में आई आई टी कानपुर में श्रम कानूनों कहा पालन नहीं होता है और उन्होंने एक रिपोर्ट बना कर लेबर डिपार्टमेंट को दी जिसमे ये माना गया था की कैसे आई आई टी कानपुर में न्यूनतम दिहाड़ी भी नहीं मिलती है। अब आप लोग सोच सकते है की जहा लोगों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती वहाँ जो बातें ठेका मजदूरों के लिए ठेका कानून में लिखी है वो मिलना तो दूर की बात है।

उसके बाद हमारे साथियों ने लेबर कमिश्नर के से बात की और उनको आई आई टी कानपुर में अगर अपनी आँखों से सब कुछ देखने के लिए कंहा और वो तैयार हो गए। दिनाक ७ मई २०१० को लेबर कमिश्नर आई आई टी कानपुर में आये और उन्होंने भी सब कुछ अपनी आँखों से देखा की कैसे लोगों से काम कराया जाता है और कैसे लोगों के काम करने की जगह पर कोई सुविधा नहीं है, और एक मजेदार बात और हुई की लोगों को आधे समय से ही छुट्टी दे दी गयी और साईट पर कोई भी रजिस्टर नहीं पूरा था।

तो साथियों उन्होंने तो सब कुछ देखा लिया लेकिन अब हम लोगों को ये देखा है की लेबर कमिश्नर क्या करते है। लेकिन हम कैसे विस्वास करे की वाकई वो कुछ करेगें क्युकी अगर वो अपना काम सही तरीके से करते तो उन्हें यहाँ आना ही नहीं पड़ता। लेकिन साथियों में आप लोगों से एक बात ही कहूँगा की हम लोगों को अगर किसी के ऊपर भरोसा करना है तो सबसे पहले अपने ऊपर भरोसा करो और उसके बाद कोई हमारा साथ देंगे तो वो हमारे साथी होंगे और जब हमारी ताकत ऐसी हो जाएगी की हम किसी को भी अपनी बात मानने के लिए मजबूर कर सके तो सभी लोग हमारी तरफ ही आयेंगे, फिर चाहे वो कोई भी क्यों नामक हो।

मजदूर है मजबूर नहीं......
हम अपना हक लेकर रहेंगे......

दीन दयाल सिंह
जन चेतना कला मंच

Monday, April 26, 2010

सलाम साथियों

आई आई टी कानपुर, जिसका नाम सुनते ही लोग क्या क्या सोचने लगते है, की वह कितनी अच्छी और खुबसूरत जगह है, और देश को कितना कुछ दे रही है, आई आई टी कानपुर। पर कभी भी वहाँ पर काम करने वाले डेली वोर्केर या ठेका मजदूर या कामगारों की के बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता। सोचने वाली बात है की जो आई आई टी देश के विकास के लिए कितना कुछ कर रही है (आई आई टी के अनुसार / अखबार के अनुसार) वो अपने वहाँ काम करने वाले इन कामगारों के विकास के लिए करने की बात तो दूर, बात भी करना नहीं चाहती।

आई आई टी कानपुर के विसिटर होस्टल में ३१ मार्च २०१० को ठेका बदलने पर वहाँ पर काम करने वाले १६ लोगो को काम पर से हटा दिया गया और उनकी जगह नये लोगों को रख लिया गया। सोचने वाली बात यह है की जब लोग रखने ही थे तो लोगो को काम पर से हटाया ही क्यों गया। इसका एक सीधा सी कारन जो निकल कर आया वो ये था की वहाँ पर पर काम कर रहे कुछ अधिकारियों के लोगों (जो या तो उनके रिश्तेदार थे, या उनकी जय जयकार करने वाले थे) को काम पर रखना था। अब ये सोचने वाली बात है की जो आदमी पिछले कई सालो से वहाँ पर काम कर रहा था उसको तुम ने कितनी आसानी से कह दिया की अब आपको आने की जरुरत नहीं है, और आपका काम ख़त्म किया जाता है। किसी ने ये नहीं सोचा की वो कल से क्या नया करने लगेगा या कल से उसके घर में कैसे काम होगा, कल को उसका बच्चा उससे पूछे की "पापा आप काम पर क्यों नहीं जा रहे है" तो वो क्या जवाब देंगे, किसी ने सोचने की जरुरत भी नहीं सोची।

लेकिन जो साथी काम पर से हटाये गए थे उन्होंने ने इस बात को सोचा और कहा की हम हार नहीं मानेगे, और सभी साथियों ने मिल कर इस पर बात की और ये निर्णय लिया की कुछ भी हो हम काम वापस लेकर रहेंगे। इन साथियों ने "हमारा मंच" के साथ बैठक की और आगे के लिए कुछ निर्णय लिया । आई आई टी प्रशासन पर दबाव बना और प्रशासन ने अपना यही पुराना तरीका अपनाया की १६ में से १० लोगों को वापस काम पर रख लिया गया, और सोचा होगा की अब हम किसी को नहीं रखेगे और इनकी लड़ाई भी कमज़ोर हो जाएगी। पर ये बड़ी अच्छी बात है की जिन साथियों को वापस काम मिल गया था उन्होंने बाकी साथियों कहा साथ नहीं छोड़ा और जो प्रशासन की सोच थी उसको सफल नहीं होने दिया और सारे साथियों ने मिलकर बात की और कुछ संगठनों से बात कर सहयोग माँगा, जिसमे कर्मचारी संगठन, आई आई टी कानपुर ने इनका पूरा साथ दिया और इनकी लड़ाई में पूरा योगदान दिया। प्रशासन के उपर काफी दबाव बनाने के बाद प्रशासन को मज़बूरी में इनको काम पर वापस रखना पड़ा।

ये पहिली बार नहीं हुआ है की आई आई की कानपुर के अंदर लोगों को काम पर से हटाया गया हो, लेकिन साथियों अब ये सोचना पड़ेगा की कब तक ये लोगों को काम पर से हटायेंगे और फिर कुछ प्रशासन पर दबाव बनाकर उनको काम वापस मिलेगा। अब सभी साथियों को एक होकर कुछ ठोस कदम लेना होगा, आखिर कब तक आई आई टी प्रशासन अपनी मर्जी से काम करेगा, आखिर ये सरकारी संस्थान है इसके कुछ कायदे - कानून है, इन कायदे कानून को ये अपनी मर्जी से तो मानने वाले नहीं है, तो हम सभी साथियों लोगों को एक होना होगा और एक संगठित ताकत बनानी होगी, जिसका डर आई आई टी कानपुर प्रशासन की नीद उड़ा दे, और हम लोगों अपने घर में चैन की नीद सोये।

मजदूर है , मजबूर नहीं....
हम अपना हक लेकर रहेंगे...

दीन दयाल सिंह
हमारा मंच