Monday, March 15, 2010

स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,

स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................

हर आगन का बुढा सूरज, परचम परचम दहक उठा,
काल सिंधु के ज्वार परिश्रम, के फूलो से महक उठा।
नाश और निर्माण जवानी की निश्छल किलकारी है,
कल का गीत लिए होठों पर आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................


स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................



जंजीरों से शुब्ध युगों तक प्रणय गीत से रणभेरी ,
मुक्ति प्रिया की पग ध्वनी लेकर घर घर लगा रही फेरी।
हेर नारे में महाकाव्य के स्राजन्कर्म की बारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................


स्रष्टि बीज कहा नाश नाश न हो हर मौसम की तयारी है,
कल का गीत लिए होठो पर, आज लड़ाई जारी है।
आज लड़ाई जारी है................

.....महेशवर

संकलन: समर तो शेष है....

Tuesday, February 16, 2010

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले

पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले
तोह्के खेतवा दिअइबो
ओमें फसली उगइबो ।
बजडा के रोटिया देई -देई नुनवा
सोचलीं कि अब त बदली कनुनवा।
अब जमीनदरवा के पनही न सहबो,
अब ना अकारथ बहे पाई खूनवा।

दुसरे चुनउवा में जब उपरैलें त बोले लगले ना
तोहके कुँइयाँ खोनइबो
सब पियसिया मेटैबो
ईहवा से उड़ी- उड़ी ऊंहा जब गैलें
सोंचलीं ईहवा के बतिया भुलैले
हमनी के धीरे से जो मनवा परैलीं
जोर से कनुनिया-कनुनिया चिलैंले ।

तीसरे चुनउवा में चेहरा देखवलें त बोले लगले ना
तोहके महल उठैबो
ओमें बिजुरी लागैबों
चमकल बिजुरी त गोसैयां दुअरिया
हमरी झोपडिया मे घहरे अन्हरिया
सोंचलीं कि अब तक जेके चुनलीं
हमके बनावे सब काठ के पुतरिया ।

अबकी टपकिहें त कहबों कि देख तूं बहुत कइलना
तोहके अब ना थकईबो
अपने हथवा उठईबो
हथवा में हमरे फसलिया भरल बा
हथवा में हमरे लहरिया भरलि बा
एही हथवा से रुस औरी चीन देश में
लूट के किलन पर बिजुरिया गिरल बा ।
जब हम ईंहवो के किलवा ढहैबो त एही हाथें ना
तोहके मटिया मिलैबों
ललका झंडा फहरैबों
त एही हाथें ना
पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले ....


------- गोरख पाण्डेय

समाजवाद


समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई

घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई

बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई

आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई

जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई

रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई

लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई

गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई

गरीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन

बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई

बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई

चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई ।

---------------- गोरख पाण्डेय

(रचनाकाल :1978)

Sunday, February 14, 2010

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम लड़ो,
तुम लड़ो, तुम लड़ो

तुम लड़ो कि चहचहा उठें हवा के परिन्‍दे
तुम लड़ो कि आसमान चूम ले ज़मीन को
तुम लड़ो कि ज़‍िन्‍दगी महक उठे
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम उठो,
तुम उठो, तुम उठो
तुम उठो, उठो कि उठ पड़ें असंख्‍य हाथ
चल पड़ो कि चल पड़ें असंख्‍य पैर साथ
मुस्‍कुरा उठे क्षितिज पे भोर की किरन
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम बहो,
तुम बहो, तुम बहो
रुधिर प्रवाह की तरह बहो कि लालिमा
मिटा सके कलंक की सितम की कालिमा
बहो कि ख़ुशी कै़द कभी की न जा सके
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम जलो,
तुम जलो, तुम जलो
तुम जलो कि रौशनी के पंख फड़फड़ा उठें
कुचल दिये गये दिलों के तार झनझना उठें
सुषुप्‍त आत्‍मा जगे, गरज उठे
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

ज़‍िन्‍दगी ने एक दिन कहा कि तुम रचो,
तुम रचो, तुम रचो
तुम रचो हवा, पहाड़, रौशनी नयी
ज़‍िन्‍दगी नयी महान आत्‍मा नयी
सांस-सांस भर उठे अमिट सुगन्‍ध से
और फिर,
प्‍यार के गीत गा उठें सभी
उड़ चलें असीम आसमान चीरते।

- शशि प्रकाश

परिकल्‍पना प्रकाशन से प्रकाशित पुस्‍तक 'कोहेकाफ पर संगीत साधना' से



साथियों ये गीत या कविता मैं दुसरे ब्लॉग या साईट से कॉपी करके पोस्ट करता हू ताकि ये जादा लोगो तक पहुँच सखे।

Thursday, February 4, 2010

लेनिन की कविता - पैरों से रौंदे जाते हैं आज़ादी के फूल


पैरों से
रौंदे जाते हैं आज़ादी के फूल
और अधिक चटख रंगों में
फिर से खिलने के लिए।
जब भी बहता है
मेहनतकश का लोहू सड़कों पर,
परचम और अधिक सुर्ख़रू
हो जाता है।
शहादतें इरादों को
फ़ौलाद बनाती हैं।
क्रान्तियाँ हारती हैं
परवान चढ़ने के लिए।
गिरे हुए परचम को
आगे बढ़कर उठा लेने वाले
हाथों की कमी नहीं होती।


---------- लेनिन











दुनिया के मज़दूरो एक हो।

गोरख पाण्डेय की कविता - कानून

लोहे के पैरों में भारी बूट

कन्‍धे से लटकती बन्दूक

कानून अपना रास्ता पकड़ेगा

हथकड़ियाँ डालकर हाथों में

तमाम ताकत से उन्हें

जेलों की ओर खींचता हुआ

गुजरेगा विचार और श्रम के बीच से

श्रम से फल को अलग करता

रखता हुआ चीजों को

पहले से तय की हुई

जगहों पर

मसलन अपराधी को

न्यायाधीश की, ग़लत को सही की

और पूँजी के दलाल को

शासक की जगह पर

रखता हुआ चलेगा

मजदूरों पर गोली की रफ्तार से

भुखमरी की रफ्तार से किसानों पर

विरोध की जुबान पर

चाकू की तरह चलेगा

व्याख्या नहीं देगा

बहते हुए ख़ून की

कानून व्याख्या से परे कहा जायेगा

देखते-देखते

वह हमारी निगाहों और सपनों में

खौफ बनकर समा जायेगा

देश के नाम पर

जनता को गिरफ्तार करेगा

जनता के नाम पर

बेच देगा देश

सुरक्षा के नाम पर

असुरक्षित करेगा

अगर कभी वह आधी रात को

आपका दरवाजा खटखटायेगा

तो फिर समझिये कि आपका

पता नहीं चल पायेगा

खबरों में इसे मुठभेड़ कहा जायेगा

पैदा होकर मिल्कियत की कोख से

बहसा जायेगा

संसद में और कचहरियों में

झूठ की सुनहली पालिश से

चमकाकर

तब तक लोहे के पैरों

चलाया जायेगा कानून

जब तक तमाम ताकत से

तोड़ा नहीं जायेगा।

----------- गोरख पाण्डेय