Sunday, October 11, 2009

एक शाम शहीदों के नाम २००९

नाटक --- गड्ढा











नृत्य --- सावन महीना मोरा जिया.....








नाटक ---- तमाशा
























नृत्य --- रंग दे बंसंती








गीत ---- जागा रे जागा सारा संसार.....





पुरस्कार वितरण










प्रोग्राम टीम




एक शाम शहीदों के नाम २००९

Monday, October 5, 2009

४ अक्टूबर २००९

सलाम साथियों
४ अक्टूबर को बाल्मीकि जयंती थी, इस अवसर पर अखिल भारतीय बाल्मीकि समाज विकास परिषद की तरफ़ से बाल्मीकि मैदान, आई आई टी कानपुर में प्रोग्राम रखा गया था। इस अवसर पर जन चेतना कला मंच कानपुर ने वहां पर गीत गए, और नाटक जो की ठेकेदारी पर था, उसका मंचन करके लोगों को समझाया की एक मजदूर को क्या चाहिए, और इस ठेकेदारी में उसको क्या मिल रहा है।
हमारे क्षेत्र के सांसद श्री राजाराम पल, आई आई टी कानपुर के निदेशक श्री संजय धांडे, मुख रूप से बुलाये गए थे। नाटक में माध्यम से हम लोग लोगों को ये दिखना चाहते थे की ठेकेदारी के काम में होता क्या है, किस तरह मजदूर से पैसे लेकर उसको काम पर लगाया जाता है, उसके बाद उससे कहा जाता है की सुबह आने का समय तो है पर शाम को जाने का समय नहीं है, और काम के समय किसी से बात नही करनी है, बाहरी लोगों से कोई भी बात नही करनी है। मजदूरों की पगार दूसरे महीने की १५ या २० तारीख को दी जाती है, वो भी बहुत कम पगार दी जाती है, जैसे मजदूर ने २६ दिन काम किया है हो उसके कार्ड पर १५ से लेकर २० दिन की हाज़री लगी होती है और ठेकेदार उनते दिन की ही पगार मजदूरों को देता है, जब एक मजदूर अपनी पगार पूरी मांगता है तो उसको मरते है और गली दे जाती है, उसके बाद जब यह लोगों से पगार और अपने काम को लेकर लोगों से बात करता है तो उसको काम से निकाल दिया जाता है, उसके बाद मजदूर लोगो को संगठित करता है और अपने हकों की मांग करता है, और जब तक मांगे नहीं मानी जाती तब तक की हड़ताल घोषित करता है। अंत में शासन प्रशासन सब को घुटने टेकने पड़ते है और मजदूरों की बात मनानी पड़ती है।
ये दोस्तों सिर्फ़ नाटक नहीं था बल्कि इस समय की हकीकत है। इस में नाटक मुख्य रूप से गौतम, विपिन, मोहित, हरेंदर, शोभित, मनोज, सचिन, भवरपाल, दीनदयाल और दीपू ने भाग लिया था।

कुछ नटखट से सवाल

साथियों सलाम
हम साथी लोग एक दिन शहीद भगत सिंह पुस्तकालय में बैठे थे और किताबे पढ़ रहे थे तो मेरे हाथ में एक किताब चकमक आई जिसको मैं पढ़ रहा था। उसमें कुछ सवाल दिए गए थे जो की मुझे बहुत ही अच्छे लगे मैं यही सवाल वहाँ लिख रहा हूं। आप लोग इसको हल करे और इसके उत्तर मुझे मेल करे।

१. राम के चाचा ने अपनी सम्पति को इस तरह से बांटा की उनकी बेटी को बेटे से तीन गुना अधिक और बेटे को माँ से दुगनी सम्पति मिले। आपको बताना है की राम की चची को कुल कितनी सम्पति मिली जबकि चाचा की कुल सम्पति १००००० थी।

२. राकेश गुल्लक में रोज पैसे डालता था। उसका एक नियम था की वो जिनते पैसे आज डालता था दुसरे दिन उसके दुगने पैसे डालता था जैसे आज १ रूपए डाले तो दुसरे दिन २ रूपए, तीसरे दिन ४ रूपए, चौथे दिन ८ रूपए और इसी तरह ये चलता रहा तो आप बता सकते है की राकेश ने २० दिनों में कितनें रूपए जमा कर लिए होंगे।

Wednesday, September 30, 2009

देश के नेता

देश के नेता बड़े निकम्मा
वोट मंगाते कहते बप्पा अम्मा
वोट हमें देना कहते है,
हमेशा हमें दिखाता रूपया पैसा
जब वो बन जाते नेता मंत्री
उनके पीछे घूमते संत्री
जब मंत्री आते बाहर पड़ते फूलो की माला
लोग सभी बोलते मंत्री जी की आला ।

चंदन तिवारी
शहीद भगत सिंह पुस्तकालय
नानकारी, कानपुर

Monday, September 21, 2009

नहीं लिखता

'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की॥ बुराई पे नही लिखता।

"कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता।

"दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी॥ सफ़ाई पे नही लिखता।

"शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़॥ मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की॥ कमाई पे नही लिखता।

"उसकी ताक़त का नशा॥ "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता।

"समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी॥ गहराई पे नही लिखता।

"पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.'

..................................ये पंकितयां मैंने अपने दोस्त के ब्लॉग पर से ली है ।

Sunday, September 20, 2009

सत्ता

कभी बैठ कर सो़चो भइया यह दंगा क्यों होता है?
बीज ज़हर के बीच हमारे क्योंकर कोई बोता?

रोटी, शिक्षा, रोजगार की जब-जब होती मांग,
दंगे की सूली पैर सत्ता सबको देती टांग ।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई इस धरती के जाये,
सत्ता के ही भेदभाव से बनते आज पराये ।

चाहे किसी दिशा से देखो यही समझ में आता,
तानाशाही और अमीरी में है सीधा नाता ।


................नीलाभ

Saturday, September 19, 2009

कविता - लालू बनिया

एक था लालू बनिया
खाता हींग बताता धनियां
एक दिन आया बुखार
गया डॉक्टर के पास
डॉक्टर ने लगायी सुई चार
भागा वो सीधे बाज़ार
चंदन
शहीद भगत सिंह पुस्तकालय
नानकारी, कानपुर

कविता - बंदर

एक था बंदर
पैर था जेल के अंदर
खाता था रोज चुकंदर
इसलिए हो गया जेल के अंदर
खाने के लिए पकडी मूली
इसलिए हो गई बंदर के शरीर में खुजली

चंदन
शहीद भगत सिंह पुस्तकालय
नानकारी, कानपुर

Thursday, September 17, 2009

एक शाम शहीदों के नाम १५ अगस्त

साथियों १५ अगस्त को हमारा प्रोग्राम एक शाम शहीदों के नाम होना था, पर शायद आसमान को ये मंजूर था। १५ अगस्त को पूरे समय पानी गिरा लेकिन साथियों ने हिम्मत नहीं हारी और जैसे ही पानी रुका वैसे ही पानी निकलने के लिए कुछ कुछ करने लगे पैर जैसे ही हम लोगो ने पानी नकाल दिया वैसे ही फ़िर पानी suru हुआ और ये सिलसिला करीब शाम ५ बजे तक चलता रहा। और फिर हम लोगों ने प्रोग्राम को १६ अगस्त को करने का प्लान बनाया।


Saturday, August 29, 2009

एक शाम शहीदों के नाम १४ अगस्त

सलाम साथियों
१४ अगस्त को जन चेतना कला मंच ने बच्चों की कुछ प्रयोगितायें करायी जिसमें चित्रकला, सामान्य ज्ञान, कविता पाठ, गीत आदि सब था। करीब १०० बच्चों नें इसमें भाग लिया।

चित्रकला और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता के कुछ फोटोग्राफ्स।













Friday, August 7, 2009

हमारा समाज

भाषण की है खेतियाँ
कागज पे उगता अनाज
डकैती, मरण, अपहरण
अपने हैं रस्मो रिवाज
कोढ में खाज
हमारा समाज
हमारा समाज
........ये पंकितियाँ मैंने "यह अंदर की बात" नामक पुस्तक से ली है।

साथियों
अगर आप घूमने का शौख रखते है तो किसी जगह जाने से पहले अनुमति जरुर ले लेना नही तो आपका भी यही हाल होगा जो ऊपर फोटो में लोगों के साथ हुआ है।
इनका कसूर सिर्फ़ इतना है की ये भारत के एक प्रसिद्ध संस्थान में बिना अनुमति के घूम रहे थे। इसकी सजा इन्हें ये मिली है। शायद इनको मालूम न हो की संस्थान में बिना अनुमति के नही घूम सकते हो। मुझे लगता है की ये शायद बोर्ड पर लिखी बात पढ़ नहीं पा रहे होंगे जिसके कारण ये संस्थान में घूमने के अनुमति नहीं ले पा रहे हो या इनको अनुमति नहीं दी जा रही है। हमें लगता है की संस्थान और कुत्तो को बैठ कर बात कर लेनी चाहिए और ये रोज की परेशानी की दूर करना चाहिए।

Tuesday, August 4, 2009

कबीर

कहता हूँ कहि जात हूँ,
कहा जो मान हमार ।
जाका गला तुम काटि हो,
सो फिर कटे तुम्हार ॥
.........कबीर
मैं बार बार कहता रहा हूँ, अगर तुम मेरी मनो तो ।
जिसका गला तुम काट रहे हो वो फिर तुम्हारा गला काटेंगे ॥
i' ve been saying,
time after time,
listen, if you care:
if you slit someone's throat
they will slit yours.
हक़ पराइया जातो नहीं
खा कर भार उठावेंगा
फेर ना आकर बदला देसें
लाखी खेत लुटावेंगा ॥
...........................बुल्ले शाह
तुम ये नहीं जानते की पराया हक़ खा कर सारी ज़िन्दगी बोझ उठायोगे ।
इसे तुम कभी भी सुधर नहीं सकते। तुम्हारी दौलत लुट कर रहेगी ॥

if tou take away
others' right
you dont't know, you'd carry a burden
never to be relived of -
and lose all that you've earned.

चुप रहना ही हिंसा की शुरुवात है

पानी

है रे पानी तू भी आज कैद हो गया। अब हमारी प्यास कौन भुझायेगा ये नज़ारा देखने के बाद शायद लोग यही कह रहे होगें।