Saturday, August 29, 2009

एक शाम शहीदों के नाम १४ अगस्त

सलाम साथियों
१४ अगस्त को जन चेतना कला मंच ने बच्चों की कुछ प्रयोगितायें करायी जिसमें चित्रकला, सामान्य ज्ञान, कविता पाठ, गीत आदि सब था। करीब १०० बच्चों नें इसमें भाग लिया।

चित्रकला और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता के कुछ फोटोग्राफ्स।













Friday, August 7, 2009

हमारा समाज

भाषण की है खेतियाँ
कागज पे उगता अनाज
डकैती, मरण, अपहरण
अपने हैं रस्मो रिवाज
कोढ में खाज
हमारा समाज
हमारा समाज
........ये पंकितियाँ मैंने "यह अंदर की बात" नामक पुस्तक से ली है।

साथियों
अगर आप घूमने का शौख रखते है तो किसी जगह जाने से पहले अनुमति जरुर ले लेना नही तो आपका भी यही हाल होगा जो ऊपर फोटो में लोगों के साथ हुआ है।
इनका कसूर सिर्फ़ इतना है की ये भारत के एक प्रसिद्ध संस्थान में बिना अनुमति के घूम रहे थे। इसकी सजा इन्हें ये मिली है। शायद इनको मालूम न हो की संस्थान में बिना अनुमति के नही घूम सकते हो। मुझे लगता है की ये शायद बोर्ड पर लिखी बात पढ़ नहीं पा रहे होंगे जिसके कारण ये संस्थान में घूमने के अनुमति नहीं ले पा रहे हो या इनको अनुमति नहीं दी जा रही है। हमें लगता है की संस्थान और कुत्तो को बैठ कर बात कर लेनी चाहिए और ये रोज की परेशानी की दूर करना चाहिए।

Tuesday, August 4, 2009

कबीर

कहता हूँ कहि जात हूँ,
कहा जो मान हमार ।
जाका गला तुम काटि हो,
सो फिर कटे तुम्हार ॥
.........कबीर
मैं बार बार कहता रहा हूँ, अगर तुम मेरी मनो तो ।
जिसका गला तुम काट रहे हो वो फिर तुम्हारा गला काटेंगे ॥
i' ve been saying,
time after time,
listen, if you care:
if you slit someone's throat
they will slit yours.
हक़ पराइया जातो नहीं
खा कर भार उठावेंगा
फेर ना आकर बदला देसें
लाखी खेत लुटावेंगा ॥
...........................बुल्ले शाह
तुम ये नहीं जानते की पराया हक़ खा कर सारी ज़िन्दगी बोझ उठायोगे ।
इसे तुम कभी भी सुधर नहीं सकते। तुम्हारी दौलत लुट कर रहेगी ॥

if tou take away
others' right
you dont't know, you'd carry a burden
never to be relived of -
and lose all that you've earned.

चुप रहना ही हिंसा की शुरुवात है

पानी

है रे पानी तू भी आज कैद हो गया। अब हमारी प्यास कौन भुझायेगा ये नज़ारा देखने के बाद शायद लोग यही कह रहे होगें।

Saturday, August 1, 2009

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

..........................................हरिवंशराय बच्चन

स्वर्ग से विदाई

भाईयों और बहनों!

अब ये आलिशान इमारत
बन कर तैयार हो गयी है.
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
अपनी भरपूर ताक़त लगाकर
आपने ज़मीन काटी
गहरी नींव डाली,
मिटटी के नीचे दब भी गए.
आपके कई साथी.

मगर आपने हिम्मत से काम लिया
पत्थर और इरादे से,
संकल्प और लोहे से,
बालू, कल्पना और सीमेंट से,
ईंट दर ईंट आपने
अटूट बुलंदी की दीवार खड़ी की.
छत ऐसी कि हाथ बढाकर,
आसमान छुआ जा सके,
बादलों से बात की जा सके.
खिड़कियाँ क्षितिज की थाह लेने वाली,
आँखों जैसी,
दरवाजे, शानदार स्वागत!

अपने घुटनों और बाजुओं और
बरौनियों के बल पर
सैकडों साल टिकी रहने वाली
यह जीती-जागती ईमारत तैयार की
अब आपने हरा भरा लान
फूलों का बागीचा
झरना और ताल भी बना दिया है
कमरे कमरे में गलीचा
और कदम कदम पर
रंग-बिरंगी रौशनी फैला दी है
गर्मी में ठंडक और ठण्ड में
गुनगुनी गर्मी का इंतजाम कर दिया है

संगीत और न्रत्य के
साज़ सामान
सही जगह पर रख दिए हैं
अलगनियां प्यालियाँ
गिलास और बोतलें
सज़ा दी हैं
कम शब्दों में कहें तो
सुख सुविधा और आजादी का
एक सुरक्षित इलाका
एक झिलमिलाता स्वर्ग
रच दिया है

इस मेहनत
और इस लगन के लिए
आपकी बहुत धन्यवाद
अब आप यहाँ से जा सकते हैं.
यह मत पूछिए की कहाँ जाए
जहाँ चाहे वहां जाएँ
फिलहाल उधर अँधेरे में
कटी ज़मीन पर
जो झोपडे डाल रखें हैं
उन्हें भी खाली कर दें
फिर जहाँ चाहे वहां जाएँ.

आप आज़ाद हैं,
हमारी जिम्मेदारी ख़तम हुई
अब एक मिनट के लिए भी
आपका यहाँ ठहरना ठीक नहीं
महामहिम आने वाले हैं
विदेशी मेहमानों के साथ
आने वाली हैं अप्सराएँ
और अफसरान
पश्चिमी धुनों पर शुरू होने वाला है
उन्मादक न्रत्य
जाम झलकने वाला है
भला यहाँ आपकी
क्या ज़रुरत हो सकती है.
और वह आपको देखकर क्या सोचेंगे
गंदे कपडे,
धुल से सने शरीर
ठीक से बोलने और हाथ हिलाने
और सर झुकाने का भी शऊर नहीं
उनकी रुचि और उम्मीद को
कितना धक्का लगेगा
और हमारी कितनी तौहीन होगी
मान लिया कि इमारत की
ये शानदार बुलंदी हासिल करने में
आपने हड्डियाँ लगा दीं
खून पसीना एक कर दिया
लेकिन इसके एवज में
मजदूरी दी जा चुकी है
अब आपको क्या चाहिए?
आप यहाँ ताल नहीं रहे हैं
आपके चेहरे के भाव भी बदल रहे हैं

शायद अपनी इस विशाल
और खूबसूरत रचना से
आपको मोह हो गया है
इसे छोड़कर जाने में दुःख हो रहा है
ऐसा हो सकता है
मगर इसका मतलब यह तो नहीं
कि आप जो कुछ भी अपने हाथ से
बनायेंगे,
वह सब आपका हो जायेगा
इस तरह तो ये सारी दुनिया
आपकी होती
फिर हम मालिक लोग कहाँ जाते
याद रखिये
मालिक मालिक होता है
मजदूर मजदूर
आपको काम करना है
हमे उसका फल भोगना है
आपको स्वर्ग बनाना है
हमे उसमें विहार करना है
अगर ऐसा सोचते हैं
कि आपको अपने काम का
पूरा फल मिलना चाहिए
तो हो सकता है
कि पिछले जन्म के आपके काम
अभावों के नरक में
ले जा रहे हों
विश्वास कीजिये
धर्म के सिवा कोई रास्ता नहीं
अब आप यहाँ से जा सकते हैं

क्या आप यहाँ से जाना ही
नहीं चाहते ?
यहीं रहना चाहते हैं,
इस आलिशान इमारत में
इन गलीचों पर पाव रखना चाहते हैं
ओह! ये तो लालच की हद है
सरासर अन्याय है
कानून और व्यवस्था पर
सीधा हमला है
दूसरों की मिलकियत पर
कब्जा करने
और दुनिया को उलट-पुलट देने का
सबसे बुनियादी अपराध है
हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे
देखिये ये भाईचारे का मसला नहीं हैं
इंसानीयत का भी नहीं
यह तो लडाई का
जीने या मरने का मसला है
हालाँकि हम खून खराबा नहीं चाहते
हम अमन चैन
सुख-सुविधा पसंद करते हैं
लेकिन आप मजबूर करेंगे
तो हमे कानून का सहारा लेने पडेगा
पुलिस और ज़रुरत पड़ी तो
फौज बुलानी होगी
हम कुचल देंगे
अपने हाथों गडे
इस स्वर्ग में रहने की
आपकी इच्छा भी कुचल देंगे
वर्ना जाइए
टूटते जोडों, उजाड़ आँखों की
आँधियों, अंधेरों और सिसकियों की
मृत्यु गुलामी
और अभावों की अपनी
बेदरोदीवार दुनिया में
चुपचाप
वापिस
चले जाइए!

-गोरख पाण्डेय

सबसे खतरनाक होता है

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

बैठे सोये पकडे जाना - बुरा तो है
डर से चुप रह जाना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

कपट के शोर में
सही होने पर दब जाना, बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढना - बुरा तो है
किटकिटा कर समय काट लेना - बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता .

सबसे खतरनाक होता है
बेजान शांति से भर जाना
ना होना तड़प का, सब सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर
और काम से घर लौट आना,
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनो का मर जाना.

सबसे खतरनाक वो घडी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़र के लिए रुकी होती है .

सबसे खतरनाक वो आँख होती है
सब कुछ देखते हुए भी जो ठंडी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चींजों से उठती अंधेपन की भाप पर फिसल जाती है
जो नित दिख रही साधारणता को पीती हुई
एक बेमतलब दोराह की भूल-भुलैया में खो जाती है.

सबसे खतरनाक वो चाँद होता है
जो हर कत्ल काण्ड के बाद
सूने आँगन में निकलता है
पर तुम्हारी आँखों में मिर्चों सा नहीं चुभता.

सबसे खतरनाक वो गीत होता है
तुम्हारे कानों तक पहुचने के लिए
जो विलाप लांघता है
डरे हुए लोगों के दरवाजों सामने
जो नसेड़ी की खांसी खांसता है.

सबसे खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाता है.
और उसकी मरी हुई धुप की कोई फांस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में उतर जाए.

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुठ्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती

-शहीद अवतार सिंह पाश

(एक लम्बी कविता से)

एक दोहा तुलसीदास का

तुलसी सरनाम, गुलाम है रामको, जाको चाहे सो कहे वोहू.
मांग के खायिबो, महजिद में रहिबो, लेबै को एक देबै को दोउ.

(मेरा नाम तुलसी है, मैं राम का गुलाम हूँ, जिसको जो मन कहे कहता हूँ, मांग के खाता हूँ, मस्जिद में रहता हूँ, न किसी से लेना, न किसी को देना.)

-तुलसीदास, (विनय चरितावली)

तुलसीदास, राम के परमभक्त थे. उन्होंने अपनी रचनाये, संस्कृत में नहीं, साधारण लोगों में प्रचलित अवधी भाषा में की, जिससे वो सब लोगों तक पहुचेइसी कारण उस समय के ब्राह्मण उनकी गिनती अपने बीच नहीं करते थेतुलसीदास ब्राह्मणों द्वारा मंदिर से निकाले जाने के बाद अयोध्या की एक मस्जिद में रहते थे

- पुस्तक "झूठ और सच" से (राम पुनियानी)

Tuesday, July 28, 2009

खुश रहो एहला वतन

खुश रहो एहला वतन ,
हम अपना फ़र्ज़ निभा के चले ,
कभी बुझने न देना उस आग को ,
जो हम सीनों में जला के चले ,
नींद आई जो हम सो गए ,
हम तो सारे वतन को जगा के चले ,
याद आए हमारी तो रोना नही ,
तुम को आज़ादी का रंग लगा के चले ,
इंकलाब जिंदाबाद .........
................................शहीद -ऐ -आज़म की याद में

ले मशालें चल पड़े है


ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गांव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के

पूछती है झोपड़ी और पूछते है खेत भी
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गांव के

बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहाँ ये जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे है लोग मेरे गांव के

चीखती है हर रुकावट ठोकरों की मार से
बेड़िया खनका रहे है लोग मेरे गांव के

लाल सूरज अब उगेगा देश के हर गांव में
अब इकटठे हो रहे है लोग मेरे गांव के

देख यारा जो सुबह लगती थी फीकी
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेर गांव के

ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गांव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के

जागा रे, जागा रे

जागा रे, जागा रे जागा सारा संसार
फूटी किरण लाल खुलता है पूरब का द्वार
जागा रे, जागा रे जागा सारा संसार

अंगड़ाई ले कर ये धरती उठी है, धरती उठी है
सदियों की ठुकराई मिट्टी उठी है, मिट्टी उठी है
हो .........टूटे हो टूटे गुलामी के बंधन हज़ार - ३
जागा रे......................

आया ज़माना ये अपना ज़माना, अपना ज़माना
किस्मत का ये रोना गाना पुराना , गाना पुराना
हो ...... बदलेंगे हम अपनी जीवन की नदिया की धार - ३
जागा रे......................

हर भूखा कहता है यूं न मरूँगा, यूं न मरूँगा
में जा के मालिक को नंगा करूँगा, नंगा करूँगा
हो ....... ढाह दूंगा दुखियारी लाशों पे उठती दीवार
जागा रे, जागा रे जागा सारा संसार




Wednesday, July 22, 2009

एक शाम शहीदों के नाम

साथियों जन चेतना कला मंच १५ अगस्त की शाम को एक शाम शहीदों के नाम के साथ मनाता आ रहा है। इसके साथ ही १४ अगस्त को कई तरह की प्रतियोगितायों का आयोजन भी करता है। इस साल जो प्रतियोगिता हो रही है।

१- चित्रकला प्रतियोगिता ।
२- सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता ।
३- निबंध लेखन प्रतियोगिता ।
इस में भाग लेने के लिया बहुत ही निम्न शुल्क रखा गया है।
१- क्लास १ से ५ तक रुपये ।
२- क्लास ६ से ८ तक ५ रुपये ।
१- क्लास ९ से १२ तक १० रुपये ।

प्रतियोगिता १४ अगस्त को २ बजे दोपहर से कर्मचारी मैदान, आई आई टी, कानपुर में आयोजित की जा रही है।
पंजीकरण की आखरी तारीख १३ अगस्त है।

इन प्रतियोगितायों में भाग लेने के लिए संपर्क करे ।
शहीद भगत सिंह पुस्तकालय
नानकारी, आई आई टी कानपुर
फ़ोन नम्बर - 9936159914 , 9198035422, 9793291033

आज न कोई नारा होगा सिर्फ़ देश बचाना होगा

साधो देखो रे जग बौराना रे साधो ।

देखो रे जग बौराना ॥

साची कहो तो मारन लागे,

झूठी कहो पतियाना

हिंदू कहत है राम हमारा,

मुस्लमान रहमाना

आपस में दोऊ लडै मरत हैं

मरम न कोई जाना ॥

घर घर मंतर देत फिरत हैं,

माया के अभिमाना

पीपर पत्थर पूजन लागे,

तीरथ गए भुलाना ॥

देखो रे जग बौराना....

माला फेरे टोपी पहिरे,

छाप तिलक अनुमाना

कहे कबीर सुनो भाई साधो,

ये सब भरम भुलाना ॥

देखो रे जग बौराना............

...............................................................................................................सहमत

६ दिसम्बर १९९२

राम वनवास से लौटकर जब घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक्से दीवानगी जो आँगन में देखा होगा
६ दिसम्बर को राम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर आए

पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
की नज़र आए वहाँ खून के धब्बे
पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरो से उठे
राजधानी की फजा आई नहीं मुझे रास
६ दिसम्बर को मिला मुझे दूसरा वनवास

..................आज़मी

Sunday, July 19, 2009

१९ जुलाई पेम


साथियों
१९ जुलाई को हम जन चेतना कला मंच के साथी पेम गांव में नाटक का मंचन करने गए। गांव पहुँचने के बाद हम लोगों ने पूरे गांव में जाकर लोगो को बुलाया और उनको बताया की हम लोग उनके गांव में नाटक करने आए है। करीब पूरे गांव में हम लोगो को १ घंटा लगा लोगो को बुलाकर लाने में। हम लोग गीत गाकर लोगों को बुला रहे थे।
उसके बाद हम लोगों ने नाटक का मंचन किया। नाटक के बाद हम लोगो ने जनता से बात की उनको नरेगा के बारे में बताया, सूचना का अधिकार २००५ के बारे में बात की, १० प्रतिशत लोगो को ही इन सब के बारे में पता था। नाटक के बाद कुछ बातें इस गांव के बारे में जो पता चली वो बहुत ही ग़लत थी, जैसे गांव का प्रधान लोगों की बात नही सुनता, उस गांव में बम्बा से पानी नहीं मिलता, आगे के गांव के लोग बम्बा को बाँध लेते है और इस गांव तक पानी नहीं आने देते है। जब लोग उनसे बात करने जाते है तो मरने की कहते है।
यहाँ पर नाटक करके नए साथियों को मालूम पड़ा की असली नाटक करने में कितनी ताकत लगती है। इस नाटक में मुख्य रूप से गौतम, मोहित, विपिन, हरेंदर, रमन, प्रमोद,सागर, जितेंदर दीनदयाल ने काम किया।




Friday, July 17, 2009

जोगीरा सारा रा... ..रा.....

जोगीरा सारा रा... ..रा.....
जोगीरा सारा रा...रा.....
विश्व बैंक के गेट पे खड़ा है एक इंसान
हमने पूछा कौन तो भईया बोला हिन्दुस्तान
कटोरा लिए खड़ा है
"होए" ,
कटोरा लिए खड़ा है
"होए"
कटोरा लिए खड़ा है
"होए"
कटोरा लिए खड़ा है
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....
नई शिक्षा नीतका नया बना मजलूम
पैसे वाले खूब पढ़ेगे जाकर देहरादून
बाकि सब भैस चराए
"होए"
बाकि सब भैस चराए
"होए"
बाकि सब भैस चराए
"होए"
बाकि सब भैस चराए
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....
संसद और विधान सभा में चलते जूता चप्पल
नेता जी अब डाकू बन गए देश बन गया चम्बल
सभी को सहना होगा...
"होए"
सभी को सहना होगा...
"होए"
सभी को सहना होगा...
"होए"
सभी को सहना होगा... "होए"
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....
संसद की इस रेल का हो गया चक्का जाम
चल चल भइया भाग चले कहीं गंगा जी के धाम
की पंडा गिरी करेगे
"होए"
की पंडा गिरी करेगे
"होए"
की पंडा गिरी करेगे
"होए"
की पंडा गिरी करेगे
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....
वकील साहब ने जज से पूछा अपनी कलम दिखाकर
अपराधी गर दोषी हो तो जल्दी से रिहा कर
क्यों की ................
सीएम का साला लगता
"होए"
सीएम का साला लगता
"होए"
सीएम का साला लगता
"होए"
सीएम का साला लगता
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....
जोगीरा सारा रा... ॥रा.....
विश्व बैंक के गेट पे खड़ा है एक इंसान
हमने पूछा कौन तो भईया बोला हिन्दुस्तान
कटोरा लिए खड़ा है
"होए" ,
कटोरा लिए खड़ा है
"होए" कटोरा लिए खड़ा है
"होए"
कटोरा लिए खड़ा है
बोल...
जोगीरा सारा रा... रा.....
"होए"
जोगीरा सारा रा... रा.....

Sunday, July 12, 2009

२ जुलाई नुकड़ नाटक गड्ढा

साथियों
जुलाई को जन चेतना कला मंच ने नुक्कड़ नाटक " गड्ढा " का मंचन मंधना में किया। गड्ढा नाटक में एक इंसान गड्ढे में गिर जाता है गड्ढे के पास से बहुत से लोग गुजरते है पैर कोई उसकी मदद नही करता है। सरकारी आदमी , पुलिस, आम जनता, समाज सेवक , यहाँ तक की गड्ढे के ऊपर पटरे रख कर नेता जी का मंच बनाया जाता है जब नेता जी को पता चलता है तो नेता जी कहते है की ये तो समाधान है गड्ढे में गरीब, बेरोजगार, आपने हक़ के लिए लड़ने वाली जनता को गिरा कर उसके ऊपर से मिट्टी गिरवा कर पुरे भारत से गरीबी, बेरोजगारी सब दूर कर देते और भारत को विकसित देश बना देते। पुलिस वाला आता है तो निकलने की जगह उसका चालान कर देता। आम जनता भी उसकी मदद नही करती है। समाज सेवक भी उसकी मदद नही करता है और कहता है की उसको पता है समाज सेवा कंहा, कब, और कैसे करना है। करीब ५० लोगो ने नाटक को देखा